Monday, October 15, 2018

ब्लॉग: #MeToo और 'तेरा पीछा ना छोड़ूँगा सोणिए’

कुछ समय पहले गाँव से पुराना रेडियो ले आया हूँ. सुबह-सुबह रेडियो सुनते हुए दफ़्तर के लिए तैयार होते हुए वो दिन याद आते हैं जब हम स्कूल के लिए तैयार होते थे और घर के एक कोने में रेडियो बजता रहता था.
हर महीने की पहली तारीख़ को किशोर कुमार का गाना बजता था - ख़ुश है ज़माना आज पहली तारीख़ है…. पहली को तनख़्वाह मिलने का दिन होता था. ये गाना सुनकर सभी ख़ुश दिखते थे.
रात को सोने से पहले पौने नौ बजे तराई की अँधेरी बस्तियों में रेडियो पर तक़रीबन रोज़ाना एक बुलंद आवाज़ गूँजती थी - ये आकाशवाणी है. अब आप देवकीनंदन पांडेय से समाचार सुनिए.
जैसे इन दिनों लगभग हर समाचार बुलेटिन की शुरुआत 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है' से होती है, तब देवकीनंदन पांडेय का पहला वाक्य होता था - प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने कहा है...
पौने नौ की ख़बरें सुनते सुनते हमें नींद आ जाती थी.
उन दिनों किशोर कुमार का एक पुराना गाना काफ़ी पॉपुलर था- लड़की चले जब सड़कों पे, आई क़यामत लड़कों पे. हम इतने बड़े तो थे कि ख़ुद के लड़का होने का एहसास हो, मगर इतना समझने लायक़ बड़े नहीं हुए थे कि लड़की के सड़कों पर चलने से लड़कों पर क़यामत कैसे आ जाएगी. वो अपने रस्ते जा रही है, हम अपने रस्ते!
क़यामत का गहरा अर्थ न भी मालूम हो फिर भी ये ज़रूर समझ में आता था कि क़यामत आने का मतलब कुछ गड़बड़ होना होता है. मसलन, अगर होमवर्क किए बिना स्कूल चले गए तो क़यामत आ सकती है.
हमें फ़िल्में देखने की मनाही का सवाल ही नहीं था क्योंकि गाँव के आसपास मीलों तक कोई सिनेमा हॉल ही नहीं था. पर रेडियो के ज़रिए किशोर कुमार से हम सीख रहे थे कि जब लड़कियाँ सड़कों पर चलती हैं तो लड़कों पर क़यामत आने का ख़तरा बना रहता है.
रविवार, 14 अक्तूबर, 2018. लौटते हैं वर्तमान में.
छुट्टी का दिन. बाहर फैली धूप सर्द दिनों के आने के संकेत दे रही है. सुबह सुबह गाँव से लाए रेडियो पर फिर से किशोर कुमार के गाने आ रहे हैं:
ग़-ग़-ग़ ग़ुस्सा इतना हसीन है तो प्यार कैसा होगा,
ऐसा जब इनकार है, इक़रार कैसा होगा...
मैं अंदाज़ा लगाता हूँ कि हिरोइन ग़ुस्से में होगी और हीरो उसे ये गाना गाकर और चिढ़ा रहा है. हिरोइन तुनक कर आगे बढ़ना चाहती होगी पर हीरो उसका रास्ता रोक रहा है. हिरोइन जितना ग़ुस्सा दिखाए, जितना इनकार करे, हीरो को लगता है वो हसीन दिख रही है. अगर प्यार जताए तो प्यार कैसा होगा.
कॉमर्शियल ब्रेक के बाद एक और गाना शुरू होता है. एक बार फिर से किशोर कुमार की आवाज़ में:
तेरा पीछा ना छोड़ूँगा सोणिए, भेज दे चाहे जेल में… दो दिलों के मेल में.
इसमें भी हिरोइन ख़ामोश है - अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि हीरो उसका पीछा कर रहा है और वो इससे ख़ुश नहीं है. पर किशोर कुमार की आवाज़ से साफ़ समझ में आता है कि हिरोइन के ग़ुस्से से हीरो को कुछ फ़र्क नहीं पड़ता. वो ऐलानिया कहता है - पीछा नहीं छोड़ूंगा, चाहे जेल भेज दे.गले कॉमर्शियल ब्रेक से पहले रेडियो के आरजे की शरारत भरी, चुलबुली आवाज़ गूंजती है - शराफ़त मेरे जिस्म से टपकती है… टपक, टपक, टपक. फिर एक 'कूल' सी शहरी हँसी. और फिर बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसी किसी सरकारी योजना का विज्ञापन शुरू हो जाता है.
मैंने वो तीनों फ़िल्में नहीं देखीं थीं जिनके गाने मैं सुन रहा था. पर यू-ट्यूब में सब कुछ उपलब्ध है.
सड़क पर जा रही सिमी ग्रेवाल के पीछे पीछे मयूर-नृत्य करते हुए राकेश रोशन दिखे. यानी सिमी ग्रेवाल वो लड़की है जो सड़कों पर चल रही है और राकेश रोशन वो लड़के हैं जिनपर क़यामत आन पड़ी है.
पर इस गाने को देखिए तो लगता है क़यामत राकेश रोशन पर नहीं सिमी ग्रेवाल पर टूट पड़ी है. लड़की अपने रस्ते जा रही है लेकिन एक शोहदा उसे सरे राह रोक रहा है और उलटे गाना गा रहा है - आई क़यामत लड़कों पर. सिमी ग्रेवाल लाख ग़ुस्सा दिखाए, हीरो बार बार स्क्रीन पर कभी यहाँ तो कभी वहाँ से टपक पड़ता है और कभी हीरोइन के गाल छूता है तो कभी उसके हाथ पकड़ कर उमेठता है.
क़यामत तो लड़की पर आ रही है.
दूसरे गाने में राजेश खन्ना उसी तरह खुली सड़क पर साड़ी में लिपटी हुई एक शरीफ़ महिला (माला सिन्हा हैं) के आगे-पीछे नाचते-गाते घूम रहे हैं और अचरज जता रहे हैं कि:
ऐसा जब इनकार है, इक़रार कैसा होगा...
हिरोइन के चेहरे पर लोकलाज है मगर हीरो के चेहरे पर 'एनटाइटिलमेंट' का भाव है. यानी हीरो कह रहा है कि हिरोइन का रास्ता रोकना उसका हक़ है. हिरोइन लोकलाज से पानी-पानी हुए जा रही है. हीरो लगातार गा रहा है - ग़ुस्सा ऐसा हसीन है तो…
अब बारी है हमारे ही-मैन धर्मेंद्र की जो हवाई जहाज़ उड़ाते हुए हेमा मालिनी को धमकी दे रहे हैं - तेरा पीछा ना छोड़ूंगा सोणिए, भेज दे चाहे जेल में.
ग़ुस्से में तमतमाई हुई हिरोइन हेमा मालिनी अपने वायरलैस सेट पर सिर्फ़ शटअप और इडियट ही कह पाती है. पर हीरो क्यों मानेगा? वो ऐलान करता है - जहाँ भी तू जाएगी मैं वहाँ चला आऊँगा… फिर धमकी देता है कि दिन में अगर तू नहीं मिली तो सपने में आकर सारी रात जगाऊँगा.

रविवार की पूरी सुबह इसी उधेड़-बुन में बीत गई कि क़यामत उस पर क्यों नहीं गिरी जो क़यामत का डर जता रहा था

Monday, October 8, 2018

भैंस पर करोड़ों क्यों ख़र्च कर रही है सरकार?

छत्तीसगढ़ में इन दिनों एक भैंस चर्चा में है. इस भैंस की क़ीमत एक करोड़ रुपये से अधिक है और इससे भी ज़्यादा महंगी है इसके रहने की जगह.
रायपुर के जिस जंगल सफ़ारी में इस भैंस को रखा गया है, उसकी प्रभारी एम मर्सी बेला कहती हैं, "इस भैंस के बाड़े को बनाने में लगभग ढाई करोड़ रुपये खर्च हुए हैं."
छत्तीसगढ़ सरकार का दावा है कि यह भैंस, एक मादा वन भैंस की क्लोन है और दुनिया में किसी वन्य जीव की यह पहली क्लोनिंग है.
दावा है कि छत्तीसगढ़ के गरियाबंद में एक बाड़े में रखी गई 'आशा' नाम की यह एक मादा वन भैंस से करनाल स्थित नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट में 12 दिसंबर 2014 को 'दीपाशा' नामक क्लोन मादा वन भैंस का जन्म हुआ.
इस क्लोन को अब छत्तीसगढ़ लाया गया है.
रायपुर के जंगल सफ़ारी में एक बाड़े में बंद इस मादा वन भैंस को अभी देखने की इजाज़त नहीं है. यहां तक कि वन विभाग के अफ़सरों को भी सेलफ़ोन या कैमरा लेकर मादा वन भैंस के बाड़े के आसपास फटकने नहीं दिया जा रहा है.
लेकिन इस क्लोन की शुद्धता को लेकर सवाल उठने लगे हैं.ज्ञानिकों का कहना है कि जिसे छत्तीसगढ़ सरकार वन भैंस का क्लोन बता रही है, उसकी विस्तृत वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए.
इस कथित वन भैंस का क्लोन तैयार करने वाले करनाल स्थित नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टिट्यूट के प्रमुख वैज्ञानिक और एनिमल बॉयोटेक्नोलॉजी सेंटर के प्रमुख डॉ. प्रभात पाल्टा ने बीबीसी को बताया, "हमने क्लोन जंगली भैंस के 'जेनेटिक मेकअप' पर विस्तृत अध्ययन नहीं किया है. हालांकि, हमने माइक्रोसेटेलाइट मार्कर्स का उपयोग करके क्लोन जंगली भैंस के बछड़े के पितृत्व की पुष्टि की है. हालांकि, माइक्रोसेटेलाइट मार्कर्स घरेलू भैंस के हैं क्योंकि जंगली भैंस के माइक्रोसेटेलाइट मार्कर्स पर कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है."
राष्ट्रीय पशु अनुवांशिक संसाधन ब्यूरो के प्रमुख वैज्ञानिक रहे डॉ. डी के सदाना ने बीबीसी से कई दौर की बातचीत के बाद कहा कि बिना जांच के इस क्लोन को वन भैंस कह पाना मुश्किल है.
उन्होंने कहा, "किसी जीव का क्लोन आमतौर पर हूबहू होता है. लेकिन मादा भैंस आशा और उसकी क्लोन दीपाशा की तस्वीरों को देखने से दीपाशा किसी घरेलू मुर्रा नस्ल की भैंस की तरह नज़र आ रही है. जब तक इसका डीएनए मैपिंग नहीं होता, तब तक वैज्ञानिक तौर पर इसके वन्य वन भैंस होने की पुष्टि नहीं की जा सकती."
हालांकि छत्तीसगढ़ के प्रधान मुख्य वन संरक्षक आरके सिंह ने पखवाड़े भर पहले बीबीसी से बातचीत में दावा किया कि क्लोन की डीएनए मैपिंग की गई है.
दूसरी ओर नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर वन भैंस की क्लोनिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले वाइल्ड लाइफ़ ट्रस्ट के डॉ. राजेंद्र मिश्रा यह तो मानते हैं कि वन भैंस की क्लोन का रूप रंग अलग है, लेकिन उनका कहना है कि कई मामलों में दुर्भाग्य से ऐसा होता है.
क्लोन तैयार करने वाली संस्था नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट तो किसी भी तरह की डीएनए मैपिंग से इनकार कर रही है.
लेकिन डॉ. राजेंद्र मिश्रा का दावा अलग है. वे कहते हैं,"करनाल में ही क्लोन डीएनए मैपिंग की गई थी और फिर से डीएनए मैपिंग के लिये हमने सरकार को पत्र लिखा है. इसके बाद स्थिति स्पष्ट हो जाएगी."
वन भैंसा छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु है.
दुनिया में 90 फीसदी से अधिक वन भैसों की आबादी भारत के पूर्वोत्तर में बसती है लेकिन मध्य भारत, ख़ासकर छत्तीसगढ़ में वन भैंसों का अस्तित्व ख़तरे में है.
बाघ या हाथी जैसे वन्यजीवों की ही तरह वन भैंसा वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-1 का जा
सरकार का दावा है कि छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी अभयारण्य में शुद्ध प्रजाति के केवल 11 वन भैंसे बचे हैं, जिनमें केवल दो मादा वन भैंस हैं.
हालांकि राज्य के इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान और पामेड़ वन्यजीव अभयारण्य में भी वन भैंसा हैं, लेकिन अब तक इन वन भैंसों को लेकर कोई विस्तृत अध्ययन नहीं हुआ है.
यही कारण है कि पिछले कई सालों से राज्य सरकार गरियाबंद के इलाक़े में बाड़े में रखकर वन भैंसों की वंश वृद्धि के लिए लगातार कोशिश करती रही है. लेकिन हर बार नर वन भैंसा का जन्म होता रहा है.
इसके बाद राज्य सरकार ने असम से शुद्ध प्रजाति के वन भैंसे लाने की कवायद शुरू की.
लेकिन इस बीच राज्य में वन भैंसों पर काम कर रही वाइल्ड लाइफ़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया ने राज्य सरकार को वन भैंसों का क्लोन तैयार करवाने का सुझाव दिया.
दस्तावेज़ बताते हैं कि वन भैंसा का क्लोन बनाने के लिये पहले छत्तीसगढ़ समेत देश के अलग-अलग हिस्सों से वन भैंसा के 69 सैंपल लिये गए. इनमें 10 सैंपल उदंती वन्यजीव अभयारण्य के थे.
हालांकि यह भी दिलचस्प है कि जिस मादा वन भैंस आशा की क्लोनिंग की गई, वह मादा वन भैंस और उसके दो बच्चे, दूसरे सभी वन भैंसों से अलग थे. जिन्हें लेकर आज भी संदेह का वातावरण है कि आशा असल में शुद्ध वन भैंस है भी या नहीं.
नवर है. इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंज़रवेशन ऑफ़ नेचर ने वन भैंसा को लुप्तप्राय प्रजाति की श्रेणी में रखा है.सी आशा नामक वन भैंस के कान के एक टुकड़े को काट कर उसे 4 डिग्री के तापमान में रख कर 24 घंटे के भीतर करनाल ले जाया गया और क्लोन बनाने की प्रक्रिया पूरी की गई.
लेकिन नेचर क्लब के सुबीर रॉय क्लोनिंग की पूरी प्रक्रिया को ही संदिग्ध और आम जनता के पैसों की बर्बादी मानते हैं. उनका कहना है कि इस क्लोन की उपयोगिता क्या होगी, इसे लेकर वन विभाग के पास कोई व्यवहारिक कार्ययोजना नहीं है.
सुबीर रॉय कहते हैं, "छत्तीसगढ़ सरकार के पास यह विकल्प था कि वह पूर्वोत्तर से शुद्ध प्रजाति के वन भैंसे लाकर यहां उनका वंश विस्तार करती, जिस पर अब जाकर सरकार काम कर रही है. इसी तरह मार्च 2015 में आशा ने ही किरण नामक मादा वन भैंसे को जन्म दिया था, उसे भी वंश विस्तार की तरह देखा जा सकता था. लेकिन सरकार ने महज पैसों की बर्बादी के लिए कथित क्लोनिंग की प्रक्रिया को अपनाया, जिसे दुनिया के अधिकांश देशों में अव्यवहारिक और अनैतिक माना जाता है."

Monday, October 1, 2018

रूस और चीन की गहराती दोस्ती क्या भारत के लिए झटका है

शीत युद्ध के बाद रूस भले अमरीका की तुलना में कमज़ोर हुआ, लेकिन अगर वो आज भी किसी देश के साथ खड़ा होता है तो अमरीका के कान खड़े हो जाते हैं.
मिसाल के तौर पर सीरिया में देखा जा सकता है. अमरीका लाख चाहता रहा कि सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद को सत्ता से बाहर किया जाए, लेकिन रूसी समर्थन ने उन्हें बचा लिया. अब दुनिया भले ही दो ध्रुवीय नहीं है, लेकिन कई मामलों में रूस और चीन आज भी अमरीकी नेतृत्व को चुनौती देते दिखते हैं.
रूस यूँ तो भारत का पारंपरिक दोस्त रहा है, लेकिन उसकी क़रीबी हाल के वर्षों में चीन से बढ़ी है. चीन और भारत के बीच 1962 में एक युद्ध हो चुका है और भारत को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा था. दोनों देशों के बीच आज भी सीमा विवाद का समाधान नहीं हो पाया है. ऐसे में रूस और चीन की दोस्ती को भारत कैसे देखता है? चीन और रूस की दोस्ती का असर भारत पर क्या पड़ेगा?
भारत और अमरीका में क़रीबी के कारण भी रूस और भारत के बीच दूरियां बढ़ी हैं. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के अनुसार 2008-2012 तक भारत के कुल हथियार आयात का 79 फ़ीसदी रूस से होता था जो पिछले पांच सालों में घटकर 62 फ़ीसदी हो गया है.
वहीं कल तक जो पाकिस्तान हथियारों की ख़रीद अमरीका से करता था अब रूस और चीन से कर रहा है. पाकिस्तान अपनी सैन्य आपूर्ति की निर्भरता अमरीका पर कम करना चाहता है. टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के अनुसार अमरीका और पाकिस्तान के बीच का हथियारों का सौदा एक अरब डॉलर से फिसलकर पिछले साल 2.1 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया है.
पूर्वी रूस और साइबेरिया में इस महीने की शुरुआत में चीनी सेना एक युद्धाभ्यास में शामिल हुई. इसमें चीनी सेना के साजो-सामान भी शामिल हुए थे. इसे 1981 के बाद का सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास बताया जा रहा है.
दोनों देशों के इस सैन्य अभ्यास को चीन और रूस की नई रणनीतिक जुगलबंदी के तौर पर देखा जा रहा है. पश्चिम के कई पर्यवेक्षकों ने तो इस युद्धाभ्यास को अमरीका के ख़िलाफ़ रूस और चीन की साझी तैयारी के तौर पर पेश किया.
कहा जा रहा है कि अमरीका ने चीन के ख़िलाफ़ जो ट्रेड वॉर शुरू किया और रूस के ख़िलाफ़ जो आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं, वैसे में दोनों देशों का साथ आना लाजिमी है.
चीन और रूस के बीच पिछले 25 सालों में संबंधों में गर्माहट आई है. हालांकि दोनों देशों में 1960 और 1970 के दशक में लड़ाई भी हुई है. सोवियत संघ के आख़िरी सालों से दोनों देशों की क़रीबी बढ़ने लगी थी.
आज की तारीख़ में दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद दोनों देशों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमरीका और उसके सहयोगियों को रोकने के लिए साथ मिलकर कई बार वीटो पावर का इस्तेमाल किया है.
दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद रूस और चीन का वो पक्ष कई बार खुलकर सामने आया है कि दुनिया बहुध्रुवीय रहे. मध्य-पूर्व में जब अमरीका, ईरान को लेकर कठोर होता है तो रूस और चीन दोनों मिलकर उदार रुख़ का परिचय देते हैं.
दुनिया भर में सभी बड़े संघर्षों पर रूस और चीन की सोच एक जैसी है. इराक़, लीबिया, सीरिया के साथ ईरानी और कोरियाई प्रायद्वीप में परमाणु समस्या पर दोनों देश एक तरह से सोचते हैं. पिछले सात सालों से रूस का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार चीन ही है.
हालांकि, रूस चीन से आयात बहुत कम करता है, लेकिन चीन रूस से व्यापक पैमाने पर आयात करता है. रूस से चीन जिन हथियारों की ख़रीदारी करता है, वो दुनिया के किसी और देश से नहीं करता है. इसके साथ ही रूस से चीन कई तरह का कच्चा माल आयात करता है.
रूस और चीन के बीच बुनियादी ढांचों को लेकर भी व्यापक सहयोग है. दोनों देशों के राष्ट्र प्रमुखों के कई वार्षिक समिट भी होते हैं. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट का कहना है कि रूस के लगभग सभी क्षेत्रों, शहरों, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में चीन की स्थायी मौजूदगी है.
हालांकि मध्य एशिया में दोनों देशों के हितों के टकराव की भी बात कही जाती है. चीन को लेकर कहा जा रहा है कि मध्य एशिया में उसका प्रभाव तेज़ी से बढ़ रहा है और इससे रूस के हित प्रभावित होंगे. हालांकि अब ये बात भी कही जा रही है कि अमरीका से मुक़ाबला करने के लिए रूस और चीन दोनों मिलकर मध्य एशिया में काम कर रहे हैं. में सोवियत संघ का पतन हुआ तो पूरी दुनिया की नज़र इस बात पर थी कि रूस और चीन के बीच राजनीतिक, आर्थिक, सैन्य और रणनीतिक संबंध कैसे होंगे. ज़ाहिर है कि भारत को लेकर दुनिया के मन में शंका नहीं थी क्योंकि भारत पहले से ही सोवियत संघ के क़रीब था.
भारत का रूस के क़रीब आना स्वाभाविक ही था. भारत का डर ये ज़रूर बना रहा कि रूस और चीन साथ आए तो उसके लिए झटका होगा. पाकिस्तान चीन का सदाबहार दोस्त रहा है और रूस से चीन की दोस्ती बढ़ी तो पाकिस्तान और रूस के रिश्तों में जमी बर्फ़ भी पिघली.
रूस और चीन के बीच की दोस्ती कोई स्वाभाविक और पारंपरिक नहीं है. दोनों देशों के बीच सदियों के अविश्वास और संघर्ष की कड़वी यादें हैं. इनमें 1968 में दोनों देशों के बीच दमेंस्की द्वीप को लेकर सैन्य संघर्ष भी हो चुका है.
हालांकि दोनों देशों ने 4000 किलोमीटर से ज़्यादा का सीमा विवाद साल 2000 में सुलझा लिया. जिस दमेंस्की द्वीप को लेकर 1968 में चीन और रूस भिड़ चुके थे वो सीमा समझौते के तहत चीन के पास है.
कूटनीति को संभावनाओं की कला कहा जाता है और किसी भी सरकार का यह पहला काम होता है कि सरहदों पर शांति कायम रखे. सरहद पर शांति को आर्थिक तरक़्क़ी के लिए ज़रूरी माना जाता है.
दुनिया के दोनों परमाणु शक्ति संपन्न इन विशाल देशों ने कलह को हमेशा के लिए सुलझा लिया. 2016 के दिसंबर महीने में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए कहा था, ''रूस और चीन के बीच व्यापक साझेदारी और रणनीतिक सहयोग वैश्विक और क्षेत्रीय शांति के लिए काफ़ी अहम है. यह साझेदारी दुनिया में किसी एक देश का वर्चस्व का सामना करने में कारगर साबित होगी. इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा कि वो देश कितना मजबूत है.''
दोनों देशों ने 1996 में शंघाई-5 नाम का एक संगठन बनाया था जो बाद में शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन (एससीओ) बना. इस संगठन के मंच तले ही बातचीत के ज़रिए दोनों देशों ने सीमा विवाद सुलझाया.
सोवियत संघ के पतन के बाद रूस की आर्थिक स्थिति कमज़ोर हुई, लेकिन कई अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का का मानना है कि चीन के साथ रूस का संबंध कभी जी हुजूरी वाला नहीं रहा. दोनों देशों के बीच विश्वास और सहमति लगभग मुद्दों पर रहे हैं.
पिछले साल मॉस्को के एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में चीन-रूस संबंधों पर बोलते हुए रूसी विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोव ने कहा था, ''यह एक ज़रूरी संबंध है और इसे बंद आंखों से आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है. अब भी हमें कई मुद्दों पर सहमति बनानी है.''
इसी सम्मेलन में रूस में 1995-98 तक चीन के राजदूत रहे ली फ़ेनलिंग ने कहा था कि दोनों देशों के बीच लंबे समय तक पारस्परिक भरोसे का अभाव रहा है.
पिछले साल मई महीने में चीन ने वन बेल्ट वन रोड समिट किया तो इसमें रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी शामिल हुए. दूसरी तरफ़ भारत वन बेल्ट वन रोड का विरोध कर रहा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आमंत्रण के बावजूद इस समिट में शामिल नहीं हुए थे.
पूरे इलाक़े में भारत इकलौता देश है जो चीन की इस महत्वाकांक्षी परियोजना का विरोध कर रहा है. रूस और चीन में मतभेद अगर कहीं उभरने की आशंका है तो वो है मध्य-एशिया. मध्य एशिया में रूस का वर्चस्व 200 सालों तक रहा है और चीन के आर्थिक विस्तार को लेकर वो आशंकित है.
मध्य एशिया में चीन का बढ़ता प्रभाव और अफ़ग़ानिस्तान, रूस का पाकिस्तान के साथ बढ़ता सहयोग भारत को चिंतित करने वाले हैं.
जेएनयू में रूसी अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर संजय पांडे कहते हैं, ''रूस और चीन का गठजोड़ पश्चिम और अमरीका के ख़िलाफ़ है, लेकिन इसका नुक़सान भारत को भी उठाना पड़ेगा. अब रूस पाकिस्तान की आलोचना नहीं करता है. भारत को रूस ने सुखोई लड़ाकू विमान की टेक्नॉलजी ट्रांसफर की थी, लेकिन चीन के साथ उसने ऐसा नहीं किया था. अब चीन को भी रूस इस स्तर की टेक्नॉलजी ट्रांसफर कर रहा है.''
संजय पांडे कहते हैं, ''अमरीका और पश्चिम से रूस को जैसी चुनौती मिल रही है उसमें चीन के साथ उसकी दोस्ती मजबूरी है. आज की वैश्विक व्यवस्था में रूस को चीन की ज़्यादा ज़रूरत है. ऐसे में रूस भारत के लिए चीन को नाराज़ नहीं करेगा. मेरा आकलन है कि अगर रूस को चीन और भारत में से किसी को एक को चुनना होगा तो वो तटस्थ रहेगा. लेकिन रूस का तटस्थ रहना भी भारत के ख़िलाफ़ ही माना जाएगा, क्योंकि रूस अब तक भारत का साथ देता रहा है.''