Tuesday, July 30, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

जब उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया तो शहर का लगभग हर शख़्स वहाँ मौजूद था.
रचना बिष्ट रावत बताती हैं, "सेनाप्रमुख जनरल वेदप्रकाश मलिक जब विक्रम के माता-पिता से शोक प्रकट करने उनके घर गए तो उन्होंने कहा कि विक्रम इतने प्रतिभाशाली थे कि अगर उनकी शहादत नहीं हुई होती तो वो मेरी कुर्सी पर बैठे होते एक दिन."
"विक्रम की माँ ने मुझसे कहा कि उनकी दो बेटियाँ थीं और वो चाहती थीं कि उनके एक बेटा पैदा हो. लेकिन उनके जुड़वाँ बेटे पैदा हुए. मैं हमेशा भगवान से पूछती थी कि मैंने तो एक ही बेटा चाहा था. मुझे दो क्यों मिल गए? जब विक्रम कारगिल की लड़ाई में मारे गए, तब मेरी समझ में आया कि एक बेटा मेरा देश के लिए था और एक मेरे लिए."
कैप्टेन विक्रम बत्रा की एक गर्ल फ़्रेंड हुआ करती थी डिंपल चीमा जो चंडीगढ़ में रहती थीं. इस समय उनकी उम्र 46 साल है. वो पंजाब सरकार के एक स्कूल में कक्षा 6 से 10 के बच्चों को समाज विज्ञान और अंग्रेज़ी पढ़ाती हैं.
रचना बिष्ट रावत बताती हैं, "उन्होंने मुझसे स्वीकार किया कि पिछले 20 सालों में कोई भी ऐसा दिन नहीं बीता जब उन्होंने विक्रम को याद नहीं किया हो."
"एक बार नादा साहेब गुरुद्वारे में परिक्रमा के बाद विक्रम ने मुझसे कहा था, "बधाई हो मिसेज़ बत्रा. हमने चार फेरे ले लिए हैं और आपके सिख धर्म के अनुसार अब हम पति और पत्नी हैं." डिंपल और विक्रम कॉलेज में एक साथ पढ़ते थे. अगर विक्रम कारगिल से सही सलामत वापस लौटे होते तो उन दोनों की शादी हो गई होती."
"विक्रम की शहादत के बाद उनके पास उनकी एक दोस्त का फ़ोन आया कि विक्रम बुरी तरह से घायल हो गए हैं और उन्हें उनके माता पिता को फ़ोन करना चाहिए. जब वो पालमपुर पहुंचीं तो उन्होंने ताबूत में विक्रम के पार्थिव शरीर को देखा. वो जानबूझकर उसके पास नहीं गईं क्योंकि वहाँ पर मीडिया के बहुत से लोग मौजूद थे."
"उसके बाद वो चंडीगढ़ लौट आईं और उन्होंने तय किया कि वो किसी से शादी करने के बजाए अपनी पूरी ज़िंदगी विक्रम की यादों में बसर करेंगी. डिंपल ने मुझे बताया कि कारगिल पर जाने से पहले विक्रम मुझे ठीक साढ़े सात बजे फ़ोन किया करते थे, चाहे वो देश के किसी भी कोने में हों."
"आज भी जब मैं कभी घड़ी की तरफ़ देखती हूँ और उसमें साढ़े सात बजे हों तो मेरे दिल की एक धड़कन मिस हो जाती है."
कैप्टेन विक्रम बत्रा को मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र दिया गया. 26 जनवरी, 2000 को उनके पिता गिरधारीलाल बत्रा ने हज़ारों लोगों के सामने उस समय के राष्ट्रपति के आर नाराणयन से वो सम्मान हासिल किया.
गिरधारी लाल बत्रा याद करते हैं, "बेशक ये हमारे लिए बहुत गौरव का क्षण था. अपने बेटे की बहादुरी के लिए राष्ट्रपति से परमवीर चक्र ग्रहण करना. लेकिन जब हम इस समारोह के बाद गाड़ी में बैठ कर वापस आ रहे थे. मेरा दूसरा बेटा विशाल भी मेरी बग़ल में बैठा हुआ था. रास्ते में मेरी आँखों से आँसू निकलने लगे."
"विशाल ने मुझसे पूछा डैडी क्या बात है? मैंने कहा बेटा मेरे मन में ये बात आ रही है कि अगर इस अवॉर्ड को विक्रम ने अपने हाथों से लिया होता तो हमारे लिए बहुत ही खुशी की बात होती."
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