Monday, September 10, 2018

के बाद से मोदी दो बार श्रीलंका जा चुके हैं.

रीलंका ने अपना हम्बनटोटा पोर्ट चीन को सौंप दिया. हालांकि ज़्यादातर चीनी प्रोजेक्ट महिंदा राजपक्षे के काल में ही शुरू हुए थे. राजपक्षे की पार्टी श्रीलंका में अब भी लोकप्रिय है. हाल ही में राजपक्षे की पार्टी को स्थानीय चुनावों में जीत मिली है.
2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से मोदी दो बार श्रीलंका जा चुके हैं. जब हम्बनटोटा पोर्ट को श्रीलंका ने चीन को सौंपा तो मोदी सरकार की आलोचना हुई थी कि वो श्रीलंका में चीन के प्रभाव को रोकने में नाकाम रही.
नेपाल के साथ भी मोदी के चार साल के शासनकाल में संबंध ख़राब हुए हैं. 2015 में भारत की अनौपचारिक नाकेबंदी के कारण नेपाल ज़रूरी सामानों की किल्लत से लंबे समय तक जूझता रहा.
यह नाकेबंदी नेपाल के नए संविधान पर मधेसियों की आपत्ति के कारण थी. नेपाल में मधेसियों की जड़ें भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार से जुड़ी हैं. इस दौरान नेपाल की राजनीति में भारत के ख़िलाफ़ एक किस्म का ग़ुस्सा पनपा और चीन से सहानुभूति पैदा हुई.
भारत ने नेपाल के संविधान में बिना किसी संशोधन के ही नाकेबंदी ख़त्म की, लेकिन तब तक हालात हाथ से निकल गए थे. 2018 में खड़ग प्रसाद ओली फिर से पीएम बने तो उन्होंने चीन के साथ कई समझौते किए.
नेपाल चीन की महत्वाकांक्षी योजना वन बेल्ट वन रोड में भी शामिल हो गया. सार्क देशों में भूटान को छोड़ सभी देश चीन की इस परियोजना में शामिल हो गए हैं. यह भारत के लिए तगड़ा झटका माना जा रहा है.
इसी तरह अफ़ग़ानिस्तान में भी तालिबान हार नहीं रहा. कहा जा रहा है कि अंततः तालिबान और पाकिस्तान के समझौते से ही कोई रास्ता निकलेगा. अफ़गानिस्तान की सत्ता में तालिबान का प्रभाव बढ़ेगा तो बदले हालात में वो भारत के बजाय पाकिस्तान को ही तवज्जो देगा.
ईरान के साथ भारत के अच्छे संबंध रहे हैं, लेकिन भारत यहां भी अमरीका को समझाने में नाकाम रहा कि वो ईरान से तेल आयात करेगा. ईरान में भारत चाबहार पोर्ट विकसित करना चाह रहा है. लेकिन इसके लिए भारत को अमरीका के प्रभाव से मुक्त होना होगा.
बांग्लादेश में इसी साल दक्षिणी और उत्तरी बांग्लादेश को जोड़ने वाला पुल बनकर तैयार हो जाएगा. इस पुल को चीन बना रहा है. छह किलोमीटर लंबा यह पुल दोनों इलाक़ों को सड़क और रेल के ज़रिए जोड़ेगा. बांग्लादेश बनने के बाद से यह इंजीनियरिंग की सबसे चुनौतीपूर्ण परियोजना थी जो बनकर तैयार होने वाली है.
यह सेतु पद्मा नदी के एक छोर से दूसरे छोर तक है. फ़ाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार इस पुल के निर्माण में चीन ने 3.7 अरब डॉलर की रक़म लगाई है. चीन ने इसमें न केवल पैसा दिया है बल्कि इंजीनियरिंग में भी मदद की है.
चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने भी बांग्लादेश में इस पुल को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है और कहा है कि दोनों देशों के बीच बढ़ती दोस्ती का यह नया प्रतिमान है.
भारत को उस वक़्त और तगड़ा झटका लगा था जब बांग्लादेश ने ढाका स्टॉक एक्सचेंज के 25 फ़ीसदी हिस्से को शंघाई और शेनज़ेन स्टॉक एक्सचेंज को 11 करोड़ 90 लाख डॉलर में बेच दिया जबकि भारत के नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) को नहीं दिया था.
एनएसई के अधिकारी ढाका भी गए थे ताकि चीन को रोक सकें, लेकिन इसमें नाकामी ही हाथ लगी थी. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार भारत ने ये भी तर्क दिया था कि चीन इस इलाक़े में राजनीतिक ताक़त का इस्तेमाल कर रहा है.
आख़िर भारत को इतने झटके क्यों लग रहे हैं? पवन वर्मा कहते हैं, ''वर्तमान सरकार की विदेशी नीति में एक रणनीतिक अभाव है. हम एडहॉक पॉलिसी पर चल रहे हैं. हम रिएक्टिव हैं जबकि हमें प्रोएक्टिव होना चाहिए था. पाकिस्तान के साथ तो एक रणनीतिक सोच का ख़ास अभाव है. चीन का जिस तरह से प्रभाव बढ़ रहा है उससे साफ़ है कि कूटनीतिक असफलता हम झेल रहे हैं. चाणक्य के देश में कूटनीति बिना रणनीति के चल रही है. मालदीव में इतना कुछ अचानक तो नहीं हुआ. हर चीज़ की पृष्ठभूमि पहले से तैयार होती है, लेकिन भारत कर क्या रहा था. मालदीव से हमारा प्रभाव बिल्कुल ख़त्म हो गया है.''
पवन वर्मा कहते हैं, ''कूटनीतिक पहलू पर भारत के सेना प्रमुख का भी बयान आता है. सरकार में कहीं न कहीं व्यवस्थागत ख़ामियां हैं. रणनीति बनाने में विदेश मंत्रालय को आप दरकिनार नहीं कर सकते. विदेश मंत्रालय की उपेक्षा की जा रही है. मुझे क्या, इस बात का एहसास सुषमा स्वराज को भी है कि उनके मंत्रालय की उपेक्षा हो रही है. वर्तमान सरकार की विदेश नीति में रणनीति और दूरदर्शिता का अभाव है.''

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