शीत युद्ध
के बाद रूस भले अमरीका की
तुलना में कमज़ोर हुआ, लेकिन अगर वो आज भी किसी देश के साथ खड़ा होता है तो
अमरीका के कान खड़े
हो जाते हैं.
मिसाल के तौर पर सीरिया में देखा
जा सकता है. अमरीका लाख चाहता रहा कि सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद को
सत्ता से बाहर किया जाए, लेकिन रूसी समर्थन ने उन्हें बचा लिया. अब दुनिया
भले ही दो ध्रुवीय नहीं है, लेकिन कई मामलों में रूस और चीन आज भी अमरीकी
नेतृ
त्व को चुनौती देते दिखते हैं.
रूस यूँ तो भारत का पारंपरिक
दोस्त रहा है, लेकिन उसकी क़रीबी हाल के वर्षों में चीन से बढ़ी है. चीन और
भारत के बीच 1962 में एक युद्ध हो चुका है और भारत को शर्मनाक हार का
सामना करना पड़ा था. दोनों देशों के बीच आज भी सीमा विवाद का समाधान नहीं
हो पाया है. ऐसे में रूस और चीन की दोस्ती को भारत कैसे देखता है?
चीन और रूस की दोस्ती का असर भारत पर क्या पड़ेगा?
भारत और अमरीका में
क़रीबी के कारण भी रूस और भारत के बीच दूरियां बढ़ी हैं. स्टॉकहोम
इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के अनुसार 2008-2012 तक भारत के कुल
हथियार आयात का 79 फ़ीसदी रूस से होता था जो पिछले पांच सालों में घटकर 62
फ़ीसदी हो गया है.
वहीं कल तक जो पाकिस्तान हथियारों की ख़रीद
अमरीका से करता था अब रूस और चीन से कर रहा है. पाकिस्तान अपनी सैन्य
आपूर्ति की निर्भरता अमरीका पर कम करना चाहता है. टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के अनुसार अमरीका और पाकिस्तान
के बीच का हथियारों
का सौदा एक अरब डॉलर से फिसलकर पिछले साल 2.1 करोड़
डॉलर तक पहुंच गया है.
पूर्वी रूस और साइबे
रिया में इस महीने की शुरुआत में चीनी सेना एक युद्धाभ्यास में शामिल हुई. इसमें चीनी सेना के
साजो-सामान भी शामिल हुए थे. इसे 1981 के बाद का सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास
बताया जा रहा है.
दोनों देशों के इस सैन्य अभ्यास को चीन और रूस की नई रणनीतिक जुगलबंदी
के तौर पर देखा जा रहा है. पश्चिम के कई पर्यवेक्षकों ने तो इस युद्धाभ्यास
को अमरीका के ख़िलाफ़
रूस और चीन की साझी तैयारी के तौर पर पेश किया.
कहा जा रहा है कि अमरीका ने चीन के ख़िलाफ़ जो ट्रेड वॉर शुरू किया और रूस के
ख़िलाफ़ जो आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं, वैसे में दोनों देशों का साथ आना
लाजिमी है.
चीन और रूस के बीच पिछले 25 सालों में संबंधों में
गर्माहट आई है. हालांकि दोनों देशों में
1960 और 1970 के दशक में लड़ाई भी
हुई है. सोवियत संघ के आख़िरी सालों से दोनों देशों की क़रीबी बढ़ने लगी
थी.
आज की तारीख़ में दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी है.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद दोनों देशों ने संयुक्त राष्ट्र
सुरक्षा परिषद में अमरीका और उसके सहयोगियों को रोकने के लिए साथ मिलकर कई बार वीटो पावर
का इस्तेमाल किया है.
दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद रूस और
चीन का वो प
क्ष कई बार खुलकर सामने आया है कि दुनिया बहुध्रुवीय रहे.
मध्य-पूर्व में जब अमरीका, ईरान को लेकर कठोर होता है तो रूस और चीन दोनों
मिलकर उदार रुख़ का परिचय देते हैं.
दुनिया भर में सभी ब
ड़े संघर्षों पर रूस और चीन की सोच एक जैसी है.
इराक़, लीबिया, सीरिया के साथ ईरानी और कोरियाई प्रायद्वीप में परमाणु
समस्या पर दोनों देश एक तरह से सोचते हैं. पिछले सात सालों से रूस का सबसे
बड़ा कारोबारी साझेदार चीन ही है.
हालांकि, रूस चीन से आयात बहुत कम
करता है, लेकिन चीन रू
स से व्यापक पैमाने पर आयात करता है. रूस से चीन जिन
हथियारों की ख़रीदारी करता है, वो दुनिया के किसी और देश से नहीं करता है.
इसके साथ ही रूस
से चीन कई तरह का कच्चा माल आयात करता है.
रूस और
चीन के बीच बुनियादी ढांचों को लेकर भी व्यापक सहयोग है. दोनों देशों के
राष्ट्र प्रमुखों के कई वार्षिक समिट भी होते हैं. साउथ चाइना मॉर्निंग
पोस्ट की एक रिपोर्ट का कहना
है कि रूस के लगभग सभी क्षेत्रों, शहरों,
विश्वविद्यालयों और शोध संस्था
नों में चीन की स्थायी मौजूदगी है.
हालांकि
मध्य एशिया में दोनों देशों के हितों के टकराव की भी बात कही जाती है. चीन
को लेकर कहा जा रहा है कि मध्य एशिया में उसका प्रभाव तेज़ी से बढ़ रहा है
और इससे रूस के हित प्रभावित होंगे
. हालांकि अब ये बात भी कही जा रही है
कि अमरीका से मुक़ाबला करने के लिए रूस और चीन दोनों मिलकर मध्य एशिया में
काम कर रहे हैं. में सोवियत संघ का पतन हुआ तो पूरी दुनिया की नज़र इस बात पर थी कि रूस
और चीन के बीच राजनीतिक, आर्थि
क, सैन्य और रणनीतिक संबंध कैसे होंगे.
ज़ाहिर है कि भारत को लेकर दुनिया के मन में शंका नहीं थी क्योंकि भारत
पहले से ही सोवियत संघ के क़रीब था.
भारत का रूस के क़रीब आना
स्वाभाविक ही था. भारत का डर ये ज़रूर बना र
हा कि रूस और चीन साथ आए तो
उसके लिए झटका होगा. पाकिस्तान चीन का सदाबहार दोस्त रहा है और रूस से चीन
की दोस्ती बढ़ी तो पाकिस्तान और रूस के रिश्तों में जमी बर्फ़ भी पिघली.
रूस
और चीन के बीच की दोस्ती कोई स्वाभाविक और पारंपरिक नहीं है. दोनों देशों
के बीच सदियों के अविश्वास और संघर्ष
की कड़वी यादें हैं. इनमें 1968 में
दोनों देशों के बीच दमेंस्की द्वीप को लेकर सैन्य संघर्ष भी हो चुका है.
हालांकि
दोनों देशों ने 4000 किलोमीटर से ज़्यादा का सीमा विवाद साल 2000 में
सुलझा
लिया. जिस दमेंस्की द्वीप को लेकर 1968 में चीन और रूस भिड़ चुके थे
वो सीमा समझौते के तहत चीन के पास है.
कूटनीति को संभावनाओं की कला कहा जाता है और किसी भी सरकार का यह पहला
काम होता है कि सरहदों पर शांति कायम रखे. सरहद पर शां
ति को आर्थिक तरक़्क़ी के लिए ज़रूरी माना जाता है.
दुनिया के दोनों परमाणु शक्ति
संपन्न इन विशाल देशों ने कलह को हमेशा के लिए सुलझा लिया. 2016 के दिसंबर
महीने में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने संसद के संयुक्त सत्र को
संबोधित कर
ते हुए कहा था, ''रूस और चीन के बीच व्यापक साझेदारी और रणनीतिक
सहयोग वैश्विक और क्षेत्रीय शांति के लिए काफ़ी अहम है. यह साझेदारी दुनिया
में किसी एक देश का वर्चस्व का सामना करने में कारगर साबित होगी. इससे कोई
फ़र्क़ नहीं पड़ेगा कि वो दे
श कितना मजबूत है.''
दोनों देशों ने
1996 में शंघाई-5 नाम का एक संगठन बनाया था जो बाद में शंघाई को-ऑपरेशन
ऑर्गेनाइजेशन (एससीओ) बना. इस संगठन के मंच तले ही बातचीत के ज़रिए दोनों
देशों ने सीमा
विवाद सुलझाया.
सोवियत संघ के पतन के बाद रूस की
आर्थिक स्थिति कमज़ोर हुई, लेकिन कई अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का का
मानना है कि चीन के साथ रूस का संबंध कभी जी हुजूरी वाला नहीं रहा. दोनों
देशों के बीच विश्वास और सहमति
लगभग मुद्दों पर रहे हैं.
पिछले साल
मॉस्को के एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में चीन-रूस संबंधों पर बोलते हुए
रूसी विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोव ने कहा था, ''यह एक ज़रूरी संबंध है और
इसे बंद आंखों से आगे नहीं बढ़ाया
जा रहा है. अब भी हमें कई मुद्दों पर
सहमति बनानी है.''
इसी सम्मेलन में रूस
में 1995-98 तक चीन के राजदूत रहे ली फ़ेनलिंग ने
कहा था कि दोनों देशों के बीच लंबे समय तक पारस्परिक भरोसे का अभाव रहा है.
पिछले साल मई महीने में चीन ने वन बेल्ट वन रोड समिट किया तो इसमें रूसी
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी शामिल हुए. दूसरी तरफ़ भारत वन बेल्ट वन
रोड का विरोध कर रहा है और प्रधा
नमंत्री नरेंद्र मोदी आमंत्रण के बावजूद इस
समिट में शामिल नहीं हुए थे.
पूरे इलाक़े में भारत
इकलौता देश है जो चीन की इस महत्वाकांक्षी परियोजना का विरोध कर रहा है. रूस और चीन में
मतभेद अगर कहीं उभरने की आशंका है तो वो है मध्य-एशिया. मध्य एशिया में रूस
का वर्चस्व 200 सालों तक रहा है और चीन के आर्थिक विस्तार को लेकर वो
आशंकित है.
मध्य एशिया में चीन का बढ़ता प्रभाव और अफ़ग़ानिस्तान, रूस का
पाकिस्तान के साथ बढ़ता सहयोग भारत को चिंतित करने वाले हैं.
जेएनयू में रूसी अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर संजय पांडे कहते हैं, ''रूस
और चीन का गठजोड़ पश्चिम और अमरीका के ख़िलाफ़ है, लेकिन इसका नुक़सान
भारत को भी उठाना पड़ेगा. अब रूस पाकिस्तान की आलोचना नहीं करता है. भारत
को रूस ने सुखोई लड़ाकू विमान की टेक्नॉलजी ट्रांसफर की थी, लेकिन चीन के
साथ उसने ऐसा नहीं किया था. अब चीन को भी रूस इस स्तर की टेक्नॉलजी
ट्रांसफ
र कर रहा है.''
संजय पांडे कहते हैं, ''अमरीका और पश्चिम से
रूस को जैसी चुनौती मिल रही है उसमें चीन के साथ उसकी
दोस्ती मजबूरी है. आज
की वैश्विक व्यवस्था में रूस को चीन की ज़्यादा ज़रूरत है. ऐसे में रूस
भारत के लिए चीन को नाराज़ नहीं करेगा. मेरा आकलन है कि अगर रूस को चीन और
भारत में से किसी को एक को चुनना होगा तो वो तटस्थ रहेगा. लेकिन रूस का
तटस्थ
रहना भी भारत के ख़िलाफ़ ही माना जाएगा, क्योंकि रूस अब तक भारत का
साथ देता रहा है.''